आखिर क्यों भड़के हैं किसान : डॉ. विजय रंजन ⁉️




हमारे देश में किसी भी सरकारी नीति की मामूली गलती का भी सबसे बड़ा दुष्प्रभाव हमारे किसानों पर होता है। क्योंकि इस देश के संघीय, आर्थिक और बहुत हद तक सामाजिक ढांचे का सबसे कोमल अंग किसान ही हैं। दरअसल उत्पीड़न, शोषण, सामाजिक आर्थिक गैरबराबरी और अनाचारों, अत्याचारों पर टिकी हमारी सत्ताएं तथा उनकी तमाम व्याख्याएं हमेशा हमारे ढांचे के कोमल अंगों को ही कुचलती रहीं हैं।




अंग्रेजों की तरह हमारी सत्ताओं ने भी यह समझ लेने में जरा भी देर नहीं लगाई कि आख़िर हमारे सामाजिक-आर्थिक ढांचे के कोमल अंगों पे प्रहार ही उनकी जागीर है। राजसत्ता और धर्मसत्ता के मनचाहे कायदे बनाना और उनकी मनचाही व्याख्या करना सरकार बहादुरों के लिए तीन पत्ती का खेल हो चला है। सरकारी सामंत और मुट्ठी भर कुलीन, जनता को हमेशा अपनी थोपी गई नैतिकता की बेड़ियों के जरिये सत्ता की खूंटी से बांधे रखना चाहते है और अधिकांश जनता भी धर्म-जाति-पार्टी की अफ़ीम चाट चाट कर उनके जय जयकारे में मगन हो जाया करती है।



नेताओं के इसी सामंती मानसिकता और समय समय पे सुविधानुसार आम जनमानस की अंधभक्ति के कारण लोकतंत्र हमारे लिए सिर्फ वोट कबाड़ने का तंत्र और कुर्सी हथियाने का मंत्र बनकर रह गया है।सरकार चाहे जिसकी भी रही हो, चंद उद्योगपतियों और सत्ताधीशों ने मिलकर सबकुछ इतना गड्डमगड्ड और विकृत कर दिया कि मूल्यों और मुद्दों के चेहरों पर भी भ्रम की धुंध और भुलावे का धुंआ छा गया। राजनीति के शातिर सुल्तान कभी नहीं चाहते कि भ्रम और भुलावे का यह छल टूटे, क्योंकि इससे असली चेहरा उजागर होने का खतरा रहता है।






भ्रम की फसल काटने और काटते रहने वाली राजनीति के चलते न तो अवाम मुल्क़ की प्राथमिकताओं पर दस्तक दे पाता और न ही असली नकली की पहचान हो पाती। आजादी के बाद से ही देश को सबसे बड़ा खतरा राजनीति की इसी चरित्रहीनता से रहा है। आज देश के किसान केवल इतना चाहते हैं कि उनकी फसल जो कोई भी खरीदे, एमएसपी(न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर ही खरीदें। इतनी सी बात का कोई सीधा जवाब देने को तैयार नहीं है। अगर आपकी मंशा में कोई खोट नहीं है, अगर आपके भारी भरकम कृषि विधेयकों में कोई झोल नहीं है, तो यह कहने में दिक्कत क्या है कि देश भर में एमएसपी अनिवार्य होगा। किसान मंडी समिति की व्यवस्था व न्यूनतम मूल्य पर खरीद जारी रखने की गारंटी की मांग कर रहे हैं।






सरकार भी हर फोरम पर कह रही है, एवमस्तु। लेकिन किसान इसे कानूनी प्रावधान के रूप में चाहता है। वैसे भी स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट के अनुसार हर साल औसतन सरकार मात्र 6-8% किसानों का अनाज ही एमएसपी पर खरीदती है और वह भी तमाम राज्यों में बिल्कुल ही नगण्य। उत्तर भारत के कई राज्यों में सरकार ने अभी तक धान की खरीद शुरू नहीं की। नतीजतन धान का एमएसपी 1868 रु प्रति क्विंटल होने के बाबजूद किसान 800 रु दर पर मजबूरन बेच रहा है। ... और झोल यहीं है। किसान इसीलिए आंदोलन कर रहे हैं। वैसे किसान भी महान हैं। वे सोच रहे हैं कि पंजाब वाले आंदोलन करे, फायदा सबको मिल जाएगा। ख़ासकर भाजपा शासित राज्यों में आंदोलन का धुंआ तक उठ नहीं रहा.. पता नहीं क्यों ..?? जनचेतना क्रांति मंच Dr. Vijay Ranjan