09-Jun-2019 11:56

राष्ट्रवाद भी सिर्फ़ चुनावी जुमले में शामिल हो गया

जातिवाद की राजनीति, धर्म की राजनीति, फिर क्षेत्रवाद की राजनीति के बाद राष्ट्रवाद भी राजनीति में शामिल।

भारत में संविधान का निर्माण ही दुनिया भर से चोरी या संग्रह कर किया गया। संविधान की मूल भावना जो महात्मा गांधी के द्वारा सुझाया गया, उसके विपरीत संविधान निर्माण किया गया। संविधान बनने में भी महात्मा गांधी का दबदबा बढ़ता जा रहा था, सूत काटते काटते। इसलिए भी महात्मा गांधी का अंत आवश्यक बन गया था। अगर उस समय भी राष्ट्रवाद राजनीति का हिस्सा रहा होता तो संविधान सशक्त बनता। भारत को महात्मा गांधी ने समझा था, लेकिन संविधान की ड्राफ्टिंग कमिटी ने महात्मा गांधी के सपनों के भारत के विपरीत प्रभाव डालकर संविधान सभा से पारित करा दिया। अगर महात्मा गांधी संविधान की तैयारियों के समय जीवित रह जाते तो आज भारत 50 साल पहले विश्व की महाशक्ति हो चुका होता।

संविधान पर आज बहस आम जनता से राजनीतिक दलों के जातिगत ठेकेदार कराते हैं। वह राजनेता जो गरीब और जातिगत आरक्षण का लाभ अपने परिवार तक बाँधकर रखा हुआ है। आम आवाम़ जो गरीब हैं, दलित हैं, पिछड़ा है, वह किसी विशेष समुदाय का नहीं हो सकता, वह तो भारत की नाकामयाबी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। शिक्षित भारत हो जाए तो चुनावी रैलीयों से राष्ट्रवाद के मुद्दे गायब हो जाएगें। क्यों भारत सरकार का लोकतांत्रिक चुनाव ही राष्ट्रवाद के लिए ही होता हैं, ना कि आज के राजनीतिक दलों के दलालों का चुनावी मुद्दा।

राजनीति में राष्ट्रवाद या पाकिस्तानवाद या मुसलमानवाद अपनी नाकामयाबी को छुपाने के लिए लाये गये हैं, ताकि पाँच साल के कार्य रिपोर्ट पर चर्चा नहीं हो सकते। राष्ट्र की मजबूती का जिम्मेदारी संवैधानिक रूप से केन्द्र यानी भारत सरकार में निहित है तो इसमें राज्यों की सरकारों के साथ आम आवाम को जोड़ना आतंरिक आतंकवाद को जन्म देते जा रहा है। आतंरिक आतंकवाद वहीं होता हैं कि आपस में फूट डालो और राज करों। यह आम बातें हो गई हैं कि रोजगार की गारंटी की बातें हो तो देश खतरें में हैंं कह कर रोजगार की इच्छा से सरकार से बात करने की इच्छा भी खत्म हो जाता हैं क्योंकि सवाल किये तो राष्ट्रवाद खतरे में आ जाएगा।

अब सही समय हैं कि दिल्ली में बैठी भारत सरकार को खुद ही राजनीति के षड्यंत्र से बाहर आ जाना चाहिए। चुनाव राजनीतिक दलों के द्वारा लड़ा जाता हैं, इसमें आम जनमानस को प्रमुखता दें। राज्यों के अधिकारों को बढ़ाये और देश के अंदर विकास की सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंप कर शिकंजा कसने का काम करें। अभी वर्तमान सरकार जो पिछले कार्यकाल में लगभग 120 योजनाओं से भी ज्यादा घोषणा की उसे इसबार कम-से-कम धरातल पर उतारें। वहीं राष्ट्र की सुरक्षा के लिए भारत की जनता को गुमराह ना करें।

09-Jun-2019 11:56

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