18-Apr-2019 06:03

राजनीति में सिद्धांत की बातें करना मुर्खता की निशानी हैं : जागरूक मतदाता (राजनीतिक पार्टी समर्थक)

भाजपा या मोदी पर टिप्पणी को हिंदुत्व और भगवा रंग का विरोधी कैसे माना जाता हैं।

बहुत समय बात कुछ विद्वानों के बीच बैठने का मौका मिला। गलती से मेरे मुँह से निकल गया " भारतीय राजनीति से सिद्धांत गायब हैं"। एक विद्वान महोदय द्वारा तपाक से कह दिया गया, क्या बोलें, मुझे लगा पता नहीं क्या बोल दिया। मैं बोला क्या, तो वो बोले कुछ अभी बोले जो..। मैं कहा बहुत कुछ बोला तो वो बोले बहुत को तो गोली मारिए, कुछ सिद्धांत की बातें कर रहे थे। हमने कहा हा हा हा हा हा हा... आज भारतीय राजनीति से सिद्धांत गायब हैं। विद्वान महोदय ने कहा आपकी सोच़ खराब है, राजनीति में सिद्धांत ततततततत....। हम बोले हा, वहीं कि आज भारतीय राजनीति में सिद्धांत नहीं हैं। आगे वह ऐसे घुरने लगे जैसे मानो मैंने कोई अपशब्द बोल दिया। तब वो बड़े शांत चीत होकर, बड़े विनम्रता से कुछ संदेश देना शुरु किये।

पहले संवाद प्रारंभ करते ही महोदय ने कहा भारतीय राजनीति में आज सिद्धांत खोजना मंगल पर पानी खोजने के बराबर हैं। आप आज के बाद कहीं भी गलती से भी भारतीय राजनीति में सिद्धांत की बात नहीं करिएगा। आपकी इस बातों के लिए जग-हँसाई हो जायेगी। भारतीय राजनीति आज सिर्फ़ सत्ता हासिल के सिद्धांत पर काम करती हैं। सिद्धांत के आधार पर भाजपा सिर्फ़ 2 सीटें जीती थी और काँग्रेस 40 सीट पर सिमट गई थी। यह नैतिक मूल्यों के सिद्धांतों के आधार की मूल जीत थी। आज पिछले कुछ समयों की ही बातें करें तो जमीर विहीन राजनीति का पोषक बनकर भारतीय राजनीति काम कर रही हैं।

दूसरी तरफ ध्यान जरूर दिजिएगा तो और कुछ नज़र आयेगा कि कैसी राजनीति चल रही हैं। आप फेसबुक पर भाजपा का विरोध नहीं करें, इससे आपके हिंदू होने पर सवालिया निशान लगाता है। आप भगवा रंग का समर्थक तभी हो सकते हैं जब भाजपा का या नरेंद्र मोदी का विरोध नहीं करेंगे। पिछले पाँच साल में जिस तरीकों से सोशल नेटवर्किंग साइट का वजूद बढ़ा हैं, उससे आम भारतीयों को गुमराह करने की कला का जोरदार तरीके बने हैं। सिद्धांत तो राजनीति में दिखाई देता भी नहीं रहा है, परंतु बोल चाल की मर्यादा से व्यक्तित्व की पहचान आसान होती थी। लेकिन आज बोलने की कला से देश को गुमराह और दिग्भ्रमित किया जा रहा है।

आज भारत में लोकसभा की 17वींं सदन के निर्माण हेतु चुनाव प्रक्रिया चल रही हैं। राजनीति दलों द्वारा जो कहा या बोला जाता हैं वह चुनाव के बाद जुमले हो जाते हैं, यह एक नई दिशा को जन्म दिया। आज शिक्षा, चिकित्सा, भोजन, कृषि, किसान, जनसंख्या नियंत्रण, सड़क, प्रदूषण, आतंकी की जगह सैनिकों की हत्या, हिंदुत्व के नाम पर हिंदुत्व की हत्या, ना जाने कितनी माँ की कोख इस हिंदुत्व के कारण उजड़ गये, तो कितने युवा हिंदुत्व के नाम पर न्यायालयों के चक्कर काट रहे हैं, कितने युवा रोजगार की खोज़ में अपराधी बना दिये गये, कितने मासूम बच्चियों के साथ बलात्कारियों द्वारा मातृत्व और मासुमियत छिन ली तो उसके पीछे संवैधानिक पद पर बैठे लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण रही हैं। इसलिए यह बहुत बड़ा सत्य लगा कि वाकई आज भारतीय राजनीति में सिद्धांत की बातें छेड़कर मैंने गुनाह ही किया है।

18-Apr-2019 06:03

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