25-Mar-2019 12:14

बेगुनाह को सजा देने की परम्परा का अंत का समय : ई. रविन्द्र कुमार सिंह

समय समय पर राष्ट्र हितों में और समाज के लिए सवर्ण समाज ने न्याय समुचे वर्ग के लिए किया है।

आज भारत का लोकतंत्र बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका के लिए खड़ी हैं। भारत के आजादी के महज ही सात दशकों में ही भारत की राजनीति न्याय प्रियता से आतंक का रूप ले चुकी हैं। चोर चोर मौसेरे भाई वाली कहावत मात्र एक कहावत नहीं है आज कि राजनीति में सटीक बैठती हैं। जिस राज्य सरकार पर भरोसा कर सवर्ण समाज ने पिछले पाँच वर्ष पूर्व केन्द्र की गद्दी पर सुशोभित किया, वहीं सरकार उसी निर्माता को ही डंक मार लिया। सवर्ण समाज हमेशा से भारत के लिए कार्य करता रहा है और समाज में सामांजस्य बनाये रखने के लिए ही अपनी सभी रियासतों का त्याग कर दिया। जिस पटेल का गुणगान आज की वर्तमान सरकार की और उन्हें भारत की आजादी के नायक के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं, वह वाकई में एक राष्ट्र भक्त समूह के सेवक मात्र थे। नेतृत्व पर भरोसा कर ही पटेल जी के माध्यम मात्र से राष्ट्र निर्माण की नींव रखी।

जिस समय भारत आजाद हुआ, इसके पास देश चलाने की बात तो दूर सूई बनाने का भी कोई जुगार ना था। लेकिन भारत ने तरक्की की और बेतहाशा समृद्धि के साथ विश्व पर प्रभाव छोड़ा। जिस समय भारत को अपने पैरों पर खड़ा होना था, उस समय भी कुछ लोग राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय एकता की नींव डाल रहे थे और कुछ कुण्ठित मानसिक तनाव से ग्रसित होकर समाज को तोड़ने का काम कर रहे थें। देश को नये नये आयाम मिले और भी थोड़ा प्रयास होने की जरूरत थी कि और बेहतरीन प्रदर्शन कर सकते थे। लेकिन सुविधाओं की कमी और दृढ़संकल्प का कहीं ना कहीं आर्थिक विकास के लिए सयमता से थोड़ा रफ्तार धीमी हुई। जिसको भुनाने में और लगाता समाज में जहर घोलने वालों द्वारा ही राजनीति के माध्यम से वार किया गया। भारत के जीतने टुकड़े आजादी के समय ना हुए वह आज राष्ट्रवाद के नाम पर रोज रोज हो रहे हैं।

विश्वास की राजनीति के कारण ही आज सवर्ण वर्ग अंधेरे में खड़ा हो गया है। भारत के इतिहास का दुर्भाग्यपूर्ण चुनाव वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव अंकित किया जाएगा। इतिहास को जब ईमानदारी से लिखा जाएगा, तो कुछ कमियों को जैसे उदाहरण " तील का तार बनाना" चरितार्थ हो जाएगा। जिस भरोसे के साथ पुरानी सरकार को चोर, घोटालेबाज कहा गया आज पाँच साल में सारे सबूतों के बावजूद सजा नहीं दिला पाया गया। ऐसा कौन सा सबूत था, जिसके दम पर 2014 का चुनाव गुजरात के निवर्तमान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने लड़ी और अराजकता और नफरतयुक्त भारत के प्रधानमंत्री बने। भगवान राम के नाम पर पुरी राजनीति करने वाली भाजपा को पूर्ण बहुमत प्राप्त होने के बावजूद राम नज़र नहीं आये। काला धन इतना सफ़ेद हो गया कि भाजपा का कार्यालय अरबों रुपये में बनकर तैयार हुए, पर उसपर कोई जी एस टी नहीं लगा। भारत की राजनीति सामाजिक न्याय के लिए विश्व प्रसिद्ध रहा है और आज आपस में लड़ाने के लिए ही भारत सरकार काम करती हैं।

खंडित भारत की जो नींव भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रख रहे हैं वह राष्ट्रवाद के लिए खतरनाक है। प्रधानमंत्री पद की गरिमा को प्रधान सेवक और फिर चौकीदार के रूप में खड़ा कर संवैधानिक व्यवस्था पर जोड़दार चमाटा मारा है। आज न्याय के लिए जब खुद न्यायालय ही छटपटा रही हैं तो आम जनता की क्या विसात हैं। वहीं कुछ 5-10% लोगों की भावनाओं के साथ खेलते हुए भारत की 100% आबादी को आपस में लड़ाने में नरेंद्र मोदी ने सफ़लता पाई है। लेकिन नरेंद्र मोदी को यह नहीं भूलना चाहिए कि आने वाले समय में भारत की जनता हिसाब लेगी, तो क्या जबाव दोगे। किसी अनपढ़, ना समझ को इतना ताकत नहीं देना चाहिए कि बिना बात के ही 5-10% मिलकर 90-95% लोगों का जीना हाराम कर दें। इसके लिए नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े रणनीतिकार और लालू यादव की भाषा में मौसम वैज्ञानिक रामविलास पासवान को पुरे खानदान सहित भारतीय राजनीति से विदा करने के लिए राष्ट्रीय समान अधिकार यात्रा की टीम कटिबद्ध हैं।

25-Mar-2019 12:14

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