12-Dec-2019 11:35

नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 : धार्मिक आधार पर उत्पीड़न और देश के बँटवारे का नया औज़ार

धार्मिक कट्टरता के प्रयासों और साम्प्रदायिक षड्यंत्रों को नाकाम करो, महँगाई, बेरोज़गारी, पूँजीवादी लूट, पर्यावरणीय विनाश, सरकारी दमन और तमाम जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ एकजुट जनान्दोलन संगठित करो!

भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI), देश की संसद के दोनों सदनों में (लोकसभा में 9 दिसम्बर 2019 को और राज्यसभा में 11 दिसम्बर 2019 को) नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 पारित किया जा चुका है। भारत को हिटलरकालीन जर्मनी और तालिबानी अफ़गानिस्तान की तरफ़ ले जाने के भाजपा के अक्षम्य प्रयास दिन दूनी रात चौगुनी गति से आगे बढ़ रहे हैं। नागरिकता संशोधन विधेयक भी इसी कड़ी में किया गया एक प्रयास है। पहले 'एनआरसी' (भारतीय राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण/नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजनशिप) और अब 'कैब' (नागरिकता संशोधन विधेयक/सिटीज़नशिप अमेण्डमेण्ड बिल) देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने के संघी षड़यंत्रों से अधिक कुछ भी नहीं हैं। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और राजपत्र में प्रकाशित होते ही यह विधेयक क़ानून बनकर लागू हो जायेगा। धर्म के आधार पर मुस्लिमों को निशाना बनाने की भाजपा और इसके सहयोगी दलों की नीयत अब और भी नंगी हो गयी है। भाजपा ने अपनी फ़ि‍तरत के मुताबिक़ ग़जब का दोगलापन भी दर्शाया है। जिस तर्क से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान के अल्पसंख्यकों के दुःख-दर्द पर छाती पीटी गयी है उसी तर्क से वर्षों से दमन और प्रताड़ना झेल रहे बर्मा के अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुस्लिमों व कुछ हिन्दुओं और श्रीलंका के अल्पसंख्यक तमिलों को कोई छूट नहीं दी गयी है।

भाजपा की साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति चढ़ी परवान मुस्लिम विरोध और साम्प्रदायिक-जातिवादी राजनीति भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ और हिन्दू महासभा जैसे इसके पूर्व और मातृ संगठनों का पुराना काम रहा है। साम्प्रदायिक और फ़ासीवादी राजनीति हमेशा ही सम्प्रदाय-विशेष को मौजूदा समस्याओं का ज़िम्मेदार ठहराती है और दंगों व सरकारी दमन के माध्यम से सामाजिक अस्थिरता पैदा करती है। पूँजीवाद की असल समस्याओं के बरक्स सम्प्रदाय-विशेष के रूप में एक नकली दुश्मन खड़ा कर दिया जाता है और लोगों का ध्यान असल मुद्दों से भटका दिया जाता है। मुनाफ़े की गिरती दर के कारण विकराल रूप धारण करने वाली आर्थिक मन्दी कहीं पूँजीवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ जनाक्रोश को भड़का न दे इसीलिए कॉरपोरेट पूँजीपति वर्ग की सेवा में जुटी फ़ासीवादी सत्ता जनता को बाँटने और आतंकित करने में जुट गयी है। यह अनायास ही नहीं है कि कुल कॉरपोरेट चन्दे का बड़ा हिस्सा भाजपा की झोली में जा रहा है। फ़ासिस्ट भाजपा सरकार और संघी संगठन अपनी राजनीति और गोयबल्सी दुष्प्रचार से बँटवारे और बर्बादी का ऐसा ताण्डव रच रहे हैं जिससे शिक्षा-चिकित्सा-रोज़गार-महँगाई-भ्रष्टाचार-दमन और लूट जैसे जीवन से जुड़े मुद्दों को भूलकर लोग जाति-मज़हब के नाम पर एक-दूसरे के दुश्मन बन रहे हैं। भाजपा दशकों से बांग्लादेशी "घुसपैठियों" के नाम पर मुस्लिमों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करती रही है। भाजपाई नेता एक-एक घुसपैठिये को निकाल बाहर करने के जुमले उछालते रहे हैं। एनआरसी को लागू करने का पहला प्रयोग असम में किया गया। अन्तिम सूची में क़रीबन 19 लाख लोगों को एनआरसी से बाहर बताया गया लेकिन इनमें से 13 लाख से भी ज़्यादा हिन्दू निकले। अब भाजपा ने नागरिक संशोधन विधेयक 2016 को पारित कराकर ''हिन्दू मुक्तिदाता'' की अपनी छवि बहाल करने और मुस्लिमों के सिर पर दोयम दर्जे का नागरिक बन जाने की तलवार लटका देने का दाँव खेला है।

नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 को पहली बार 19 जुलाई 2016 को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था। उसी साल 12 अगस्त 2016 को इसे संयुक्त संसदीय समिति को सौंप दिया गया था। उक्त समिति ने इस साल जनवरी 2019 में इस पर अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। 2019 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा दोबारा सत्ता में आयी। इसके बाद 9 दिसम्बर 2019 को गृहमन्त्रीP अमित शाह द्वारा यह विधेयक दोबारा लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। लोकसभा में पहली ही बार में इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। 11 दिसम्बर 2019 को यह विधेयक राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया व यहाँ भी इसे पारित कर दिया गया। अब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और राजपत्र में प्रकाशित होने के बाद यह क़ानून बन जायेगा और फिर अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के सभी प्रवासी हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई भारतीय नागरिकता के योग्य हो जायेंगे। इसके अलावा इन तीन देशों के छह धर्मों के लोगों को भारतीय नागरिकता पाने के नियमों में भी छूट दी जायेगी। ऐसे सभी प्रवासी जो छह साल से भारत में रह रहे होंगे, उन्हें यहाँ की नागरिकता मिल सकेगी। पहले यह समय-सीमा 11 साल थी। केवल मुसलमानों को इस दायरे से बाहर रखा गया है। यह संशोधन विधेयक पड़ोसी देशों से आने वाले सिर्फ़ मुस्लिम लोगों को ही ‘अवैध प्रवासी’ मानता है, जबकि लगभग अन्य सभी धर्मों से जुड़े लोगों को नागरिकता प्रदान किये जा सकने वाले दायरे में रखा गया है। इस प्रकार जो अतिसीमित जनवादी अधिकार भी भारतीय संविधान देने का कथित तौर पर वायदा करता है यह विधेयक उसका भी निषेध करता है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का साफ़ उल्लंघन करता है जिसमें धर्म, वंश, जाति, लिंग और जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव को नकारा गया है। यह मानवाधिकारों के स्थापित मानदण्डों का भी उल्लंघन करता है। संविधान कहता है कि जो इस देश में पैदा हुआ वह भारत का नागरिक है, लेकिन इस विधेयक के बाद भाजपा सरकार का घोषित अगला क़दम राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को पूरे देश में लागू करना है जिसके तहत देश में पैदा होने वाले और पीढ़ियों से इस देश में रहने वालों को भी अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ेगी। असम के अनुभव ने साफ़ कर दिया है कि अपनी नागरिकता साबित करने के लिए दर-दर भटकना पड़ेगा और भ्रष्ट सरकारी तन्त्र पर निर्भर होना पड़ेगा। असल में इसके सबसे अधिक शिकार देश के ग़रीब और मेहनतकश लोग ही होंगे।

भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत कोई भी व्यक्ति जन्म या वंश या देशीकरण या पंजीकरण के ज़रिये भारत की नागरिकता का हक़दार बनता है। लेकिन हिन्दू राष्ट्र बनाने के अपने एजेण्डा को देश पर थोपने की कोशिश में संघ और भाजपा नागरिकता की परिभाषा बदलना चाह रहे हैं। भाजपा सरकार का कहना है कि इस विधेयक से पड़ोसी मुल्क़ों के अल्पसंख्यक समुदायों को सुरक्षा दी जायेगी जबकि असलियत यह है कि यह सरकार अपने ही देश के अल्पसंख्यकों का बर्बर दमन-उत्पीड़न करने वाले तत्वों के विरुद्ध कार्रवाई करना तो दूर उन्हें बढ़ावा देती रही है। यह विधेयक उन पड़ोसी देशों की समस्याओं को अनदेखा करता है जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक नहीं हैं पर उत्पीड़न के शिकार हैं। जैसे, म्यांमार के रोहिंग्या मुस्लिम, जिनको संयुक्त राष्ट्र ने इस समय का सर्वाधिक उत्पीड़ित अल्पसंख्यक समुदाय माना है ध्यान रहे रोहिंग्या उत्पीड़ितों में एक आबादी हिन्दू धर्म से भी ताल्लुक रखती है। यह विधेयक उन मुस्लिमों को भी अनदेखा करता है जिन पर मुस्लिम-बहुल देशो में ही अत्याचार हो रहे हैं क्योंकि वे किसी ख़ास सम्प्रदाय के हैं, जैसे पाकिस्तान के अहमदिया और बिहारी मुसलमान। नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 का विरोध करो नागरिकता संशोधन विधेयक का देशभर में विरोध उठ खड़ा हुआ है। लेकिन विरोध की पृष्ठभूमि अलग-अलग है। असम में इस विधेयक का इस तौर पर विरोध किया जा रहा है कि इस विधेयक के पास होकर क़ानून बन जाने की स्थिति में केवल मुस्लिमों को ही निकाल बाहर किया जायेगा जबकि असमिया राष्ट्रवादियों की माँग है कि सभी प्रवासियों को ही असम से निकाल बाहर किया जाये। यह अपनेआप में एक जनविरोधी माँग है। असम में प्रवासियों की बहुसंख्‍यक आबादी बेहद ग़रीब और मेहनतकश लोगों की है जो पीढ़ि‍यों से वहाँ रह रही है। प्रवासी और ग़ैर-असमिया लोगों के असम में विरोध की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रही है जिसका फ़ायदा हमेशा ही शासक वर्गों और फ़िरकापरस्त असमिया बुर्जुआ राष्ट्रवादी ताक़तों ने उठाया है। पूँजीवाद असमान विकास के ज़रिये इस प्रकार की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को लगातार पैदा करता है जिसके कारण पूँजी और श्रम की आवाजाही और प्रवास पूँजीवाद में एक अवश्यम्भावी परिघटना बनती जाती है। पूँजीवादी राज्यसत्ता और तमाम बुर्जुआ दल राष्ट्रवादी और अस्मितावादी ज़मीन पर खड़े होकर राजनीतिक तौर पर अपने एजेण्डा को पूरा करने के मक़सद से इसका लाभ ही उठाते हैं। इस मसले पर मज़दूरवर्गीय दृष्टिकोण से अवस्थिति अपनाने की दरकार है, ना कि बुर्जुआ उपराष्ट्रवाद, अस्मितावाद और मूलनिवासीवाद के प्रतिक्रियावादी नारे के साथ सुर में सुर मिलाकर बह जाने की, जैसा कि कम्युनिस्ट आन्दोलन में कुछ भाषाई अस्मितावादी आज कर रहे हैं। मगर देश के ज़्यादातर हिस्सों में नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध इसके साम्प्रदायिक और गैर-जनवादी चरित्र के कारण हो रहा है। भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) भाजपा की धर्म के आधार पर लोगों को बाँटने की कट्टर साम्प्रदायिक फ़ासीवादी राजनीति का कड़ा विरोध करती है। हमारा यह स्पष्ट मानना है कि संसद में बैठकर गत्ते की तलवारें भांजने से नहीं बल्कि सड़कों के जनान्दोलनों से ही भाजपा के ख़ूनी खेल को रोका जा सकता है। हम भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति को नकारने और इसके बरक्स शिक्षा-चिकित्सा-रोज़गार-महँगाई-लूट-दमन जैसे जीवन से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर संगठित होकर पूरे मानवद्रोही पूँजीवादी निज़ाम को ही उखाड़ फेंकने के लिए जनता का आह्वान करते हैं। धर्म को आधार बनाकर नागरिकता देने के साम्प्रदायिक एजेण्डे का हम कड़ा प्रतिकार करते हैं। हमारा यह स्पष्ट मानना है कि प्रत्येक राष्ट्रीयता, नस्ल, धर्म, लिंग और जाति से जुड़े व्यक्ति के मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। ख़ासतौर पर बेहतर अवसरों और जीवन स्थितियों की तलाश में दर-दर भटक रही मेहनतकश आबादी को उचित जीवन सुविधाएँ मुहैया करायी जानी चाहिए। नागरिकता सम्बन्धित क़ानूनों में किसी भी आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। लोगों के अधिकार छीन लेने, विरोधियों को दोयम दर्जे का नागरिक बना देने और जनता के दमन का भाजपाई एजेण्डा यही नहीं रुकने वाला है। यह अतिशयोक्ति नहीं कि कल को येन-केन-प्रकारेण राजनीतिक विरोधियों को भी नागरिकता से वंचित करने का षड्यंत्र रचा जाये। जनता को शिक्षा-रोज़गार-चिकित्सा जैसे उसके असल मुद्दों पर संगठिक करने वालों को उनके सभी क़ानूनी अधिकार छीनकर जेलों या डिटेंशन सेंटरों में डाल दिया जाये! जनता का संगठित प्रतिरोध ही संघियों की नापाक हरक़तों का जवाब हो सकता है तथा हर प्रकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध ही हमारे ज़िन्दा होने का सबूत भी हो सकता है।

12-Dec-2019 11:35

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