27-Dec-2019 10:47

झारखंड ने कर दिखाया, अब बिहार की बारी

शिक्षकों को अपनी आवाज़ उठाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री के इशारे पर हुई पुलिसिया कार्रवाई ने खूब सुर्खियां बटोरीं। शिक्षकों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा गया जिसका वीडियो कई मेनस्ट्रीम मीडिया ने दिखाया।

बीते दिन झारखंड विधानसभा के चुनाव का परिणाम आया, सारे देश की नजर इस चुनाव के नतीजों पर थी। मेरी जन्मभूमि झारखंड होने के कारण मुझे भी इस परिणाम का इंतजार था, लेकिन शिक्षक होने के नाते उत्सुकता और ज़्यादा थी। आशा है कि न सिर्फ पड़ोसी राज्य बल्कि शिक्षक होने के नाते आप सभी बंधुओं को भी इसका इंतज़ार होगा। यूं तो देश के अलग अलग हिस्सों में होने वाले चुनाव के अनगिनत मुद्दे होते हैं। लेकिन झारखंड में होने वाले चुनाव में कई मुद्दों के साथ साथ पारा शिक्षकों के वेतनमान का मुद्दा भी अहम था। वैसे तो भारत में शिक्षकों का मुद्दा कभी चुनावी मुद्दा बनता ही नहीं है, लेकिन झारखंड के पारा शिक्षकों ने अनवरत आंदोलन के जरिए इसे चुनावी मुद्दा में तब्दील किया। और तो और चुनाव के ठीक पहले मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में क्रांतिकारी शिक्षकों ने अपनी मांगों को जाहिर करके इस आंदोलन को जनता के समक्ष लाने का प्रयास किया। इसी घटनाक्रम में शिक्षकों को अपनी आवाज़ उठाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री के इशारे पर हुई पुलिसिया कार्रवाई ने खूब सुर्खियां बटोरीं। शिक्षकों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा गया जिसका वीडियो कई मेनस्ट्रीम मीडिया ने दिखाया।

इस प्रकार शिक्षकों का मुद्दा चुनावी मुद्दा बना। लेकिन पारा शिक्षकों ने इसे केवल चुनावी मुद्दा बनाकर ही संतोष नहीं किया, बल्कि शिक्षकों के हुए अपमान और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाले कृत्य का बदला लेने की ठानी। और ऐसी सरकार को उखाड़ फेंकने का दृढ़ निश्चय किया। उस दृढ़ निश्चय का साक्षी मैं खुद हूं, मैंने अपनी आंखों से देखा है कि शिक्षक समाज ने वर्ग, संप्रदाय, जाति, मजहब से ऊपर उठ कर चट्टानी एकता का परिचय देते हुए केवल और केवल एक ही लक्ष्य रखा, शिक्षकों का अपमान करने वाली सरकार को उखाड़ फेंकना। प्रत्येक व्यक्ति की कोई न कोई विचारधारा होती है और उन विचारधाराओं के आधार पर वह अपनी पसंद की राजनैतिक पार्टी का चुनाव करता है, लेकिन शिक्षक समाज ने अपने व्यक्तिगत पसंद को दरकिनार करते हुए केवल एक ही लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित रखा। लोग जुड़ते चले गए और शिक्षकों का प्रयास रंग लाया। यहां गौर करने वाली बात ये है कि मेरा बिल्कुल ही ऐसा मानना नहीं है कि इस सारी चुनावी जीत और हार का कारण केवल और केवल शिक्षकों का जन आंदोलन ही रहा, जैसा कि मैंने ऊपर पहले ही जिक्र किया है कि चुनाव के अनगिनत मुद्दे होते हैं लेकिन सिक्षकों के आंदोलन ने भी महत्ती भूमिका निभाई। अब कुछ बातें अपनी कर्मभूमि की भी कर ली जाय। जो हाल झारखंड में पारा शिक्षकों का है कमोबेश वही हाल बिहार में नियोजित शिक्षकों का भी है। अपनी विभिन्न मांगो को लेकर जिला मुख्यालय जहानाबाद से लेे कर प्रमंडल मुख्यालय और राज्य की राजधानी तक कई आंदोलनों में शामिल होने का मौका मुझे भी मिला है। मेरे आंदोलन में शामिल होने का अंतराल बहुत ही कम रहा है लेकिन अपने अल्पकाल में ही हमारी असफलताओं के कारण क्या हैं। मैं जिन निष्कर्षों पर पहुंचा हूं, आपसे साझा करता हूं।

पहला कारण- वेतनमान की मांग चुनावी मुद्दा न बनना अपने छोटे से कार्यकाल में मैंने बिहार में तीन चुनाव देखे हैं, 2014 का लोकसभा का चुनाव, 2015 का विधानसभा का चुनाव और अभी हाल ही में सत्रहवीं लोकसभा का चुनाव संपन्न हुआ। लगभग साढ़े चार लाख नियोजित शिक्षक होने के बाद भी इन तीनों चुनाव में कभी भी शिक्षकों के वेतनमान का मुद्दा चुनावी नहीं बन सका। जिसका पहला खामियाजा यह हुआ कि चुनाव के समय नजदीक आते ही जिस प्रकार अन्य मुद्दों का निराकरण करने की सरकार की जो तत्परता रहती है उसका हमें कभी लाभ नहीं मिला। दूसरा खामियाजा ये हुआ कि किसी भी राजनैतिक दल के चुनावी घोषणा पत्र में हमारे वेतनमान संबंधी विसंगतियों का कोई जिक्र नहीं हुआ। दूसरा कारण- शिक्षकों का कई संगठनों में बंटा होना जिस प्रकार से बिहार में शिक्षकों ने अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अनगिनत संघटनो का निर्माण किया है, वह हमारी विफलताओं का एक बड़ा कारण है। पहला तो यह कि हम किसी आंदोलन की शुरुआत में ही अपनी डफ़ली अपना राग अलापने लगते हैं, बाद में किसी प्रकार आंदोलन एकीकृत होता भी है तो कोई न कोई संगठन अपने व्यक्तिगत हितों के कारण सरकार से समझौता कर लेती है। और हमारा आंदोलन विफल हो जाता है, 2015 का चायनीज वेतनमान मिलना इसका जीता जागता उदाहरण है। तीसरा कारण - शिक्षकों का वोट बैंक न होना आज के राजनैतिक परिदृश्य में राजनीतिक दल उन्हीं मुद्दों पर ध्यान देती है, जिसमें उन्हें एक वोट बैंक की आशा हो। कहने को तो हम साढ़े चार लाख नियोजित शिक्षक हैं, लेकिन जिस प्रकार चुनाव के वक़्त हम जाति, धर्म, वर्ग और संप्रदाय के नाम पर अपना कीमती वोट विभिन्न राजनीतिक दलों को रेवड़ियों की तरह बांटते है उस का खामियाजा हमें भुगतना पड़ता है। चौथा कारण- आंदोलन का सुनियोजित न होना कोई भी आंदोलन तभी सफल होता है जब उसकी कोई सुनियोजित रूपरेखा हो। आज तक के तमाम आंदोलनों में मुझे कोई स्पष्ट रूपरेखा नजर नहीं आई। 2015 में जब हमने मूल्यांकन का बहिष्कार किया तो सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए कई दुष्प्रचार किए। कहा गया कि कॉपियों का मूल्यांकन दूसरे राज्य में होगा या प्राइवेट स्कूल के शिक्षक करेंगे। जिससे हमारे शिक्षक बंधुओं में कहीं न कहीं आत्मविश्वास की कमी घर कर गई, कि सच में अगर सरकार ने ऐसा कोई कदम उठा लिया तो हम ठगे हुए महसूस करेंगे। इसलिए आनन फानन में हमने चाइनीज वेतनमान पर ही अपना आंदोलन वापस ले लिया। जबकि इस आंदोलन की शुरुआत हमें वार्षिक परीक्षा का बहिष्कार करके करना चाहिए था, इसमें हमें प्राथमिक और मध्य विद्यालयों के शिक्षकों का भी सहयोग मिलता।

पांचवां कारण- शिक्षकों का समाज में नकारात्मक छवि किसी भी आंदोलन की सफलता तब तक एक स्वप्न बन कर रह जाती है जब वो जन आंदोलन का रूप न ले ले। वर्तमान सरकार ने मीडिया के माध्यम से शिक्षकों की नकारात्मक छवि समाज में स्थापित कर दी है। शिक्षकों का स्कूल में अनुपस्थित रहने के एक दो मामलों को ऐसे बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जाता है, जैसे लगता है कि बिहार के सभी विद्यालयों की यही स्थिति हो। "शिक्षकों का चार माह का वेतन जारी" जैसे हेडलाइन भी नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश का ही एक हिस्सा है। इस कारण से हमें समाज का अपेक्षित सहयोग हमें नहीं मिल पाता। हमारा प्रयास तो यह होना चाहिए था सरकार के साथ साथ हमें अपने मुद्दों को जनता के समक्ष भी रखना चाहिए था, लेकिन हम ऐसा करने में असफल रहे। इन मुख्य कारणों के अलावा भी विभिन्न कारण रहे जिसके चलते हमारा आंदोलन सफल नहीं हुआ। उच्चतम न्यायालय में शिक्षकों का समान काम समान वेतन का केस हारना और आंदोलनों का असफल रहना, हम शिक्षक बंधुओं में एक निराशा का भाव उत्पन्न कर रहा था। लेकिन हमें झारखंड के पारा शिक्षकों से सीख लेने की आवश्यकता है। हमें तो इस सरकार ने न सिर्फ कई मौकों पर शारीरिक रूप से क्षति पहुंचाई है, बल्कि शाब्दिक बाण के माध्यम से भी हमारे आत्मसम्मान को कुचला गया है। सुशासन बाबू हमारी तुलना दिल्ली और गुजरात के मजदूरों से करते हैं, कोई शिक्षा मंत्री हमारी तुलना प्राइवेट स्कूलों के शिक्षक से करता है तो कोई हमें अयोग्य कह देता है। लेकिन हमारा आत्मसम्मान जागता ही नहीं। अब हमें अपने आत्मसम्मान को जगाने का वक़्त आ गया है। अब हमें आर पार की लड़ाई लड़ने का प्रण लेने का वक़्त आ गया है। हमें अपने हर अपमान का बदला लेने का वक़्त आ गया है। नया वर्ष आने वाला है, और ये नया वर्ष न केवल नया वर्ष होगा बल्कि चुनावी वर्ष भी होगा। इसलिए हमें अपनी विफलताओं के कारणों से सीख लेते हुए अपने आंदोलन को पुनः तेज करना होगा। वार्षिक परीक्षा और मूल्यांकन का भी समय नजदीक है, ऐसे में हमें अभी से ही सुनियोजित तरीके से अपने आंदोलन की रूपरेखा तय करना होगा। हमें समझना होगा कि अगर इस बार चूके तो ऐसा अवसर दुबारा नहीं मिलेगा। झारखंड ने कर दिखाया है अब बिहार की बारी है। हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

27-Dec-2019 10:47

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