02-Jan-2019 06:10

ऐतिहासिक दृष्टि से शुरूआत किया राष्ट्रीय समान अधिकार यात्रा, अब नहीं संभले तो फिर नहीं : सुजीत कुमार

यह यात्रा भारतीय संविधान की गरिमा को परिभाषित करने वाली साबित होगी । आजादी के 72 वर्षों में पहली बार कोई सामाजिक कार्यकर्ता पहुँच रहा जन-जन तक।

यह विचारणीय है कि अब नहीं तो फिर कभी नहीं, इसलिए आगे बढ़े । राष्ट्रीय समान अधिकार यात्रा के राष्ट्रीय सह-संयोजक सुजीत कुमार कहते हैं कि सवर्णों की एकता राजनैतिक पार्टियों से हमेशा बाहर रही हैं। राजनीति दलों में परिवर्तन करने के उद्देश्य से समर्थन कभी भी दिया है। पिछले तीन दशकों की ही बातें करते हैं तो सामाजिक न्याय के नेताओं को 1990 में स्थापित किया। तो वहीं सामाजिक न्याय के नेताओं का सामाजिक जीवन और समाज पर राजनैतिक गलत प्रभाव को कम करने के लिए ही सुशासन बाबू की सरकार बनाई। तो वहीं अच्छे दिन की सरकार बनाने का उद्देश्य भारत को सुदृढ़ बनाने के लिए अपने खुद के उपर मार्केटिंग का भार लेकर दिन-रात फेसबुक, व्हाट्सएप एवं अन्य सोशल साइट्स विश्वविद्यालयों पर आंदोलन के रूप में जंग छेड़ी। जब भी राजनीतिक परिवर्तन की बातें हुईं हैं सवर्णों ने महती भूमिका निभाई है। जिसका परिणाम पुरा भारत टकटकी लगाए देखता रहा है और शायद चंद दिनों पहले ही पाँच राज्यों में राजनीतिक हार से बहुत कुछ स्पष्ट हो गया है।

याद रखने वाली बातें यह है कि भारत की राजनीतिक सोच़ ना तो दिल और ना ही दिमाग से चलाया जाता हैं। भारत की राजनीति आज जज्बातों के साथ चलाया जाता हैं। वहींं जज्बात की पुँजी जाति, धर्म, समुदाय, क्षेत्रवाद में समाहित हो चला हैं। आप अगर बुद्धिजीवी वर्ग से हैं तो आपको बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। आप दया के लिए लाईन की जगह लाईन बनाने पर विश्वास रखने वालों में से होते हुए डरे और सहमें हुए हैं। छोटी-छोटी बातों में जातिवाद और धर्मवाद का जहर घोल कर सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को तार-तार कर दिया गया है। एक दूसरे के साथ ही समाज निर्माण करता आया है, लेकिन भारत के सदनों में बैठे माननीय जाति का बैरियर बनाकर दो पार्ट में बाँँट दिया हैं।

आज हमें समझने की जरूरत है कि हम सभी लोग मिलकर भारत को समझने का प्रयास करें। आज जो मैं बात़े रखने जा रहा हूँ वह बिहार ही नहीं बल्कि भारत की प्रतिष्ठा पर प्रभाव छोड़ेगा। राजनीति के सरताजों द्वारा लगातार भारत की परम्पराओं को कुचलने का काम किया है। भारत की सभ्यता और संस्कृति को विद्यालयों से उठाकर गंगा में प्रवाहित कर दिया है। शिक्षा, स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के जगह पर जातिवाद के बीज बोये गये हैं। आज भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य से पहले जाति और धर्म की बात होती हैं। योग्यता शब्द अब भारत में संवैधानिक व्यवस्था से बाहर कर दिया गया है। योग्यता को कुचलने के लिए अंग्रेजों की भाँति रौंदा जा रहा है। वक्त की माँग ही हैं कि आप और हम संभल जाए।

उपर्युक्त बातों से चिंतित होकर ही ई. रविन्द्र कुमार सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय समान अधिकार यात्रा की नींव रखी गई। आज ई. सिंह ने सफलता पूर्वक 25 जिलोंं में जनसंपर्क सफल बनाया है। यह बातें स्पष्ट है कि समाज में सामाजिक न्याय, सुशासन बाबू, अच्छे दिन की सरकारें बिहार से लेकर दिल्ली तक का सफ़र देख लोग थक गए हैं। सदनों में बैठे लोग हमारे उपर शासन संवैधानिक व्यवस्था के तहत करते हैं और संविधान की आर में सामाजिक चेतना से युक्त समाज पर काले कानूनों के माध्यम से शिकंजा कसते रहते हैं। इसलिए जरूरत है कि भारत की अखंडता को बनाये रखने के लिए सवर्णों को एक होना होगा। बात़े यहाँ सवर्णों की नहीं है क्योंकि काले कानून SC/ST अत्यचार निरोधक कानून के माध्यम से भारत की 85% जनसंख्या सीधे प्रभावित हो रही हैं। वहीं 15% जिन्हें यह अधिकार दिया गया उन्हें कुछ समयों बाद भोजन पानी तक के लिए सामाजिक रूप से तरसना पड़ेगा। कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए होथा है ना कि समाज को खंडित खंडित करने के लिए। सामाजिक द्वैष को बढ़ाने के लिए SC/ST अत्यचार निरोधक कानून व्यवस्था को घटिया स्तर तक बनाया गया है। जिसका प्रतिफल है कि इस 15% लोगो़ को सरकार शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, मेहनत आदि से दूर रखकर निकम्मा बना देने का बीड़ा उठा ली हैं। इसलिए समाज को नेतृत्व प्रदान करने के लिए भारत के सरकार द्वारा घोषित सवर्ण समाज को एक मंच पर 25 फरवरी 2019 को आना होगा।

02-Jan-2019 06:10

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