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अमित शाह के नागरिकता बिल से क्यों हिल गया अमेरिका ?

नागरिकता बिल से खुल सकता है USCIRF का एजेंडा

अहमदाबाद, 10 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। संसद के शीतकालीन सत्र में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से लाये गये नागरिकता संशोधन बिल (CAB) पर पूरे देश में राजनीतिक भूचाल जैसी स्थिति है और सभी विरोधी दल एक स्वर में इस बिल पर कोहराम मचा रहे हैं। वैसे इस बिल ने देश में ही नहीं, अपितु पड़ोसी देशों और यहाँ तक कि अमेरिका में भी हड़कंप मचा दिया है, क्योंकि इस बिल के मायने इतने व्यापक हैं कि इससे पाकिस्तान ही नहीं, अपितु अमेरिका के गुप्त एजेंडे भी बुरी तरह से प्रभावित होने वाले हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो अमित शाह ने पाकिस्तान के साथ-साथ अमेरिका में भी सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है, तभी तो अमेरिका में ट्रंप सरकार से अमित शाह पर बैन लगाने तक की माँग की जाने लगी है। अमेरिका की जो संस्था यह माँग कर रही है, आज हम उसी संस्था के उस गुप्त एजेंडे को ‘युवाPRESS’ के मंच से उजागर करने जा रहे हैं, जो आपको भी चौंका देगा और यह भी स्पष्ट कर देगा कि इस संस्था को अमित शाह पर बैन लगाने की माँग क्यों करनी पड़ रही है ? अमित शाह पर बैन लगाने की माँग कर रहा है USCIRF वैसे तो मोदी सरकार के नागरिकता संशोधन बिल पर अमेरिकी ट्रंप सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, परंतु यूएस कमीशन फॉर इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) ने बयान जारी करके इसे गलत दिशा में उठाया गया एक खतरनाक कदम बताया है। इतना ही नहीं, इस आयोग ने यह बिल यदि संसद के दोनों सदनों में पारित हो जाता है तो भारत के गृह मंत्री अमित शाह के विरुद्ध अमेरिकी सरकार से प्रतिबंध लगाने की भी माँग की है। इस आयोग ने सोमवार को जारी अपने बयान में भारत के नागरिकता संशोधन बिल को लेकर अमेरिकी सरकार के समक्ष अपनी चिंता भी जाहिर की है। इस आयोग का कहना है कि बिल में धर्म का जो आधार लिया गया है, उसे लेकर ही यह आयोग चिंतित है। आयोग का आरोप है कि बिल मुस्लिमों को छोड़ कर बाकी प्रवासियों के लिये नागरिकता पाने का मार्ग खोलता है, यानी कि नागरिकता के कानूनी दायरे का आधार धर्म को बना दिया गया है। आयोग के मुताबिक यह गलत दिशा में उठाया गया एक खतरनाक कदम है, जो भारत के धर्मनिरपेक्षता के समृद्ध इतिहास और भारतीय संविधान के उस प्रावधान के विरुद्ध है, जिसमें धर्म को आधार बनाये बिना कानून के समक्ष सभी को समानता के अधिकार की गारंटी दी गई है। आयोग ने नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) को लेकर भी टिप्पणी की है और अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि उसे डर है कि भारत की वर्तमान सरकार भारतीय नागरिकता के लिये एक रिलीजन टेस्ट करवा रही है, जो लाखों मुस्लिमों से उनकी नागरिकता छीन लेगा। इस बयान में यह भी कहा गया है कि एक दशक से भी अधिक समय से भारत सरकार इस आयोग के बयानों और वार्षिक रिपोर्ट्स को भी नजरअंदाज़ करती आ रही है।

बिल क्लिंटन के कार्यकाल में बना अमेरिका का धार्मिक स्वतंत्रता कानून इस आयोग के सुझाव और उसकी रिपोर्ट्स वैसे तो बंधनकर्ता नहीं हैं और भारत की पूर्ववर्ती तथा वर्तमान सभी सरकारें यह स्पष्टता करती आ रही हैं कि भारत अपने आंतरिक मामलों में किसी भी अन्य देश के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेगा, परंतु अमेरिकी सरकार और विशेष कर अमेरिका का विदेश मंत्रालय इस आयोग के सुझावों को गंभीरता से लेता है। इसका कारण यह है कि अमेरिकी सरकार ने 1998 में तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पर इसाई-विस्तारवादी चर्च और मिशनरी संस्थाओं के दबाव से ‘अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (कानून)’ बनवा कर पारित करवाया था। इस अधिनियम के तहत अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता की निगरानी के लिये विदेश मंत्रालय में एक राजदूत की नियुक्ति की गई थी और अमेरिकी सरकार (व्हाइट हाउस), उसके विदेश मंत्रालय और अमेरिकी संसद को सलाह देने के लिये ‘यूएस कमीशन ऑफ इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ)’ का गठन किया गया था।

क्या है USCIRF का गुप्त एजेंडा ? अब इस संस्था के गुप्त एजेंडे के बारे में जानिये। यह संस्था धार्मिक स्वतंत्रता को गैर-इसाइयों (विशेष कर हिंदुओं) को धर्मांतरण की आज़ादी के रूप में पारिभाषित करते हुए धर्मांतरण में बाधाएँ उत्पन्न करने वाले देशों के विरुद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति को भड़काने का काम करती रहती है। उन देशों के प्रति अमेरिका की विदेश नीतियों को भी प्रभावित और नियंत्रित करती है। अमेरिका में 1998 में पारित हुए धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को धार्मिक स्वतंत्रता का हनन करने वाले अर्थात् धर्मान्तरण में बाधाएँ उत्पन्न करने वाले देशों को अमेरिकी सहयोग से वंचित या प्रतिबंधित करने तक का अधिकार प्राप्त है। यह संस्था कहने को तो दुनिया के सभी देशों में धार्मिक स्वतंत्रता की समीक्षा करती है, किन्तु वास्तव में उसके निशाने पर गैर-इसाई देश ही होते हैं। इनमें भी गैर-पैगंबरवादी और मूर्तिपूजक धर्मानुयायी यानी कि हिंदू बहुल देश सीधे तौर पर कहें तो भारत मुख्य निशाने पर है। व्हाइट हाउस से सीधे-सीधे संचालित होने वाला यह आयोग भारत में सक्रिय विभिन्न चर्च-मिशनरियों और दलित फ्रीडम नेटवर्क, ऑल इण्डिया क्रिश्चियन कौंसिल तथा फ्रीडम हाउस जैसे चर्च समर्थित एनजीओ और उनके भारतीय अभिकर्ताओं, कार्यकर्ताओं के सुनियोजित जाल के माध्यम से हिंदुओं को आक्रामक-हिंसक प्रमाणित करते हुए उनकी तथाकथित आक्रामकता व हिंसा के कारण मुसलमानों व इसाइयों की धार्मिक स्वतंत्रता के हनन संबंधी काल्पनिक मामले रच कर या गढ़ कर उनकी सुनवाई करता है। बाद में उन सुनवाइयों के निष्कर्ष के आधार पर भारत के अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिये अमेरिकी सरकार से हस्तक्षेप करने की अनुशंसा करते हुए अमेरिका की विदेश नीतियों को प्रभावित और नियंत्रित करता है। अमेरिका के इस आयोग की हिंदू-विरोधी धर्मान्तरणकारी धूर्तताओं का समय-समय पर खुलासा भी होता आया है। वर्ष 2000 में इस आयोग द्वारा व्हाइट हाउस को दी गई भारत संबंधी एक रिपोर्ट में धर्मान्तरित बंगाली हिंदुओं के प्रत्यावर्तन (अपने धर्म में वापसी) को नहीं रोक पाने पर वहाँ की माकपाई सरकार के विरुद्ध शिकायत की गई थी। साथ ही धर्मान्तरित इसाइयों के हिंदू धर्म में वापसी को ‘अंधकार में प्रवेश’ बताते हुए चिंता जाहिर की गई थी। यह आयोग हिंदू समाज के किसी व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रूप से किसी गैर-हिंदू के विरुद्ध की गई हिंसा को भी पूरे अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध आक्रामक-हिंसक हिंदुओं की संगठित हिंसा के रूप में बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है। वर्ष 2003 की अपनी रिपोर्ट में इस आयोग ने भारत के ‘विदेशी आब्रजन अधिनियम’ की यह कह कर आलोचना की थी कि इससे ‘विदेशी इसाई प्रचारकों का मुक्त प्रवाह’ बाधित होता है। इसी आयोग के दबाव में वर्ष 2004 में अमेरिकी कांग्रेस के चार सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल ने भारत का दौरा किया था, जिसके अध्यक्ष जोसेफ पिट्स ने धर्मान्तरण रोकने सम्बंधी भारतीय कानूनों की आलोचना करते हुए कहा था कि यह कानूनी मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता का हनन करने वाले हैं। इस आयोग की ऐसी ही अनुशंसाओं के आधार पर अमेरिका ने वर्ष 2009 में भारत को अफग़ानिस्तान के साथ विशेष चिंताजनक विषय वाले देशों की सूची में शामिल कर दिया था। यह आयोग दलितों के हिंदू धर्म-समाज से जुड़े रहने को ‘ग़ुलामी’ और धर्मान्तरित होकर इसाई बन जाने को ‘मुक्ति’ बताता आया है। इसके साथ ही यह आयोग दलितों, आदिवासियों सहित पिछड़ी जातियों को इसाई धर्म में धर्मान्तरित करवा कर हिंदू समाज की ‘वर्ण व्यवस्था’ को खत्म करने और धर्मान्तरण का मार्ग प्रशस्त करने के लिये भारत में अमेरिकी शासन के हस्तक्षेप की बार-बार सिफारिश करता रहता है। यह आयोग हर साल अमेरिकी कांग्रेस और व्हाइट हाउस को अपनी रिपोर्ट सौंपता है, जिसमें भारत को भर-भर के कोसता है। इस आयोग की वर्ष 2018 की भारत विरोधी रिपोर्ट की बात करें तो इस रिपोर्ट में भी इस आयोग ने मोदी सरकार की जमकर आलोचना की और पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत में हिंदुओं तथा अल्पसंख्यकों के बीच हुई सामान्य झड़पों को बढ़ा-चढ़ा कर गोरक्षा के बहाने हिंसक हिंदुओं द्वारा अल्पसंख्यकों पर किये गये हमलों के रूप में खपाने का प्रयास किया था। इस आयोग की रिपोर्ट के हवाले से ही अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने बयान दिया था कि भारत में 2015 से 2017 के दौरान सांप्रदायिक घटनाएँ 9 प्रतिशत बढ़ गई हैं। आयोग की रिपोर्ट में इसकी भी आलोचना की गई है कि भारत के 24 राज्यों में गोवध पर प्रतिबंध लगाया गया है। इतना ही नहीं, यह आयोग तो ‘इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज करने’ और फैज़ाबाद का नाम बदल कर अयोध्या करने की भी निंदा कर चुका है।

नागरिकता बिल से खुल सकता है USCIRF का एजेंडा अमित शाह ने लोकसभा में नागरिकता बिल पेश करते हुए सवाल उठाया था कि बँटवारे के समय पाकिस्तान में हिंदुओं की संख्या लगभग 23 प्रतिशत थी जो 2011 के आँकड़ों के अनुसार घटकर 2 प्रतिशत से भी कम रह गई है। इसी प्रकार बांग्लादेश में भी अल्पसंख्यक हिंदुओं की संख्या में भारी गिरावट आई है। इतनी बड़ी संख्या में हिंदू लोग कहाँ गायब हो गये ? क्या उनका जबरन धर्मपरिवर्तन करा दिया गया है ? शाह यही वो बयान है, जिसने अमेरिका के इस आयोग को भयभीत कर दिया है। उसे डर है कि भारत में नागरिकता बिल पास हो जाने पर और एनआरसी से देश में जो बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन हुआ है, उसकी पोल खुल जाएगी और उसकी इसाई-विस्तारवादी एजेंडे को करारा झटका लगेगा। इसीलिये आयोग का अमित शाह को बैन करने वाला बयान दर्शाता है कि यह आयोग शाह के कदम से कितना विचलित हो गया है ?

14-Dec-2019 04:16

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