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बिहार विधानसभा चुनाव 2020

लोकतंत्र की बहुत ही खुबसूरत प्रक्रिया चुनाव में, आम जनता की भागीदारी। आम जनता जो आम तौर पर चुपचाप रहकर यह देखता है कि कौन सी राजनीतिक दल सामाजिक न्याय के साथ समाज का विकास करती हैं। यह एक सुनहरा अवसर है, जो कुछ लोगों को यह शक्ति देता है कि वह आम जनता के विकास के लिए काम करें। बिहार की राजनीति बहुत आसान नहीं मानी जाती हैं तो बहुत मुश्किल भी नहीं है। बिहार विधानसभा का चुनाव 2020 में अगस्त, सितंबर एवं अक्टूबर में होने की संभावना है और चुनाव के परिणाम नवंबर मध्य तक आपेक्षित होगा। बिहार विधानसभा में कुछ 243 सीटें हैं, जिसमें 38 सीटें अनुसूचित जाति और 2 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए कुछ 40 सीटें आरक्षित श्रेणी में डाला गया है।
ज्ञात हो कि 7 फरवरी 1921 को बिहार विधानसभा की स्थापना हुई थी। आज बिहार विधानसभा भवन एक नये विधानसभा पर जाने की तैयारी में हैं, तो वहीं विधानसभा सचिवालय की वर्षों पहले ही नये सचिवालय में स्थानांतरण हो चुकी हैं।
बिहार विधानसभा में पहली बार 152 विधायक चुने गए थे और आज यह सीट 243 हैं।
1937 में पहली बार विधानसभा में सदस्यों की संख्या 152 तय की गई। सबका प्रत्यक्ष निर्वाचन होता था। 1952 एवं 1957 के आम चुनावों में 330 सदस्यों का प्रत्यक्ष निर्वाचन हुआ, जबकि एंग्लो-इंडियन समूह से एक सदस्य को मनोनीत किया गया था। 1977 में सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 325 कर दी गई। परिसीमन के बाद यह संख्या घटकर 318 रह गई। हालांकि वर्ष 1977 में फिर 324 सीटें हो गईं, जो राज्य विभाजन तक बरकरार रही। वर्ष 2000 में जब अलग झारखंड बना तो निर्वाचित 81 विधायक उसके सदस्य हो गए। मनोनीत सदस्य को भी झारखंड से ही संबद्ध कर दिया गया। इस तरह बिहार विधानसभा में सदस्यों की संख्या कुल 243 रह गई।

बिहार विधानसभा सीट - 243

बिहार विधानसभा में पहली बार 152 विधायक चुने गए थे और आज यह सीट 243 हैं
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बिहार के विकास की बागडोर सीधे तौर पर मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी होती हैं। मुख्यमंत्री के निर्देश पर मंत्रीमंडल बनाया जाता है ताकि कामों का बांटवारा कर जमीन पर उतारा जाए। वहीं बिहार के विकास, सुरक्षा और न्याय तीनों अपनी अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हैं।
  1. मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, विभागीय मंत्री, विभागीय प्रधान सचिव, जिला में आने के साथ जिला प्रभारी मंत्री, अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव, जिलाधिकारी या समाहर्ता, उप समाहर्ता, उप विकास आयुक्त, अनुमंडल विकास पदाधिकारी, प्रखंड विकास पदाधिकारी, पंचायत सचिव जैसे एक-एक पंचायत तक सरकारी पदाधिकारियों की तादाद हैं।
  2. मुख्यमंत्री, विभागीय मंत्री, जिला में आने के साथ जिला प्रभारी मंत्री, सांसद, विधायक, सभापति, उपसभापति (नगर क्षेत्र), जिला परिषद, प्रमुख, उपप्रमुख, (प्रखंड), मुखिया, उपमुखिया, पंचायत समिति, वार्ड। ये तमाम सभी जनप्रतिनिधि हैं, जो वादे आधारित काम करते हैं।
  3. मुख्यमंत्री, विभागीय प्रभारी मंत्री, जिलाधिकारी, पंच, सरपंच न्याय के लिए बनाये गये हैं।
सरकार की योजनाओं को धरातल पर उतारने में उपर्युक्त सभी सरकारी एवं जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी होती हैं। प्रत्येक सप्ताह के दौरान लगातार बैठकों का दौर जारी रहता है। कर्मचारियों की संख्या सीमित, वर्षो से पद रिक्त, संविदा नियुक्ति, वेतन कम, समय अनिश्चित, शनिवार, रविवार की छुट्टी में भी कार्यालय अभी, अभी ये करो, अभी वो करो, बस करते रहो‌। हमेशा असंतुलित मेनेजमेंट के कारण बिहार की जनता के लिए व्यवस्था खराब हैं। लगातार अधिकारियों, पदाधिकारी की बैठक, जिस देश व राज्य मे केवल और केवल समीक्षा करने वालों की संख्या, काम करने वालों की संख्या से ज्यादा हो जाये वहां विकास मात्र एक दिवास्वप्न ही रहेगा ।
यही हाल लगभग बिहार के प्रत्येक क्षेत्र में है।
इसलिए हम हकीकत से आपका परिचय कराने के लिए आये हैं।

धन्यवाद

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